Here is something what we have from past 100's of years. In today's life what object we can say is healthy.We should follow our Ayurveda to live a healthy life.

2018


दोस्तो भारत मे बहुत बड़े बड़े ऋषि हुये ! चरक ऋषि ,पतंजलि ऋषि ,शुश्रुत ऋषि ऐसे एक ऋषि हुए है 3000 साल पहले बाकभट्ट ऋषि ! उन्होने 135 साल के जीवन मे एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था अष्टांग हृद्यम उसमे उन्होने ने मानव शरीर के लिए सैंकड़ों सूत्र लिखे थे उनमे से एक सूत्र के बारे मे आप  पढे ! बाग्भट्टजी एक जगह लिख रहे है ! कि जब भी आप आराम करे मतलब सुबह या शाम या रात को सोये तो हमेशा दिशाओ का ध्यान रख कर सोये| अब यहाँ पे वास्तु घुस गया वास्तुशास्त्र | वास्तु भी विज्ञान ही है| तो वो कहते की इसका जरूर ध्यान रखे|



क्या ध्यान रखे ? तो वो कहते है हमेशा आराम करते समय सोते समय आपका सिर सूर्य की दिशा मे रहे ! सूर्य की दिशा मतलब पूर्व और पैर हमेशा पश्चिम की तरफ रहे !और वो कहते कोई मजबूरी आ जाए कोई भी मजबूरी के कारण आप सिर पूर्व की और नहीं कर सकते तो दक्षिण (south)मे जरूर कर ले| तो या तो east या south| जब भी आराम करे तो सिर हमेशा पूर्व मे ही रहे| पैर हमेशा पश्चिम मे रहे !और कोई मजबूरी हो तो दूसरी दिशा है दक्षिण| दक्षिण मे सिर रखे उत्तर दिशा मे पैर|
आगे के सूत्र मे बागभट्ट जी कहते है उत्तर मे सिर करके कभी न सोये| फिर आगे के सूत्र मे लिखते है उत्तर की दिशा म्रत्यु की दिशा है सोने के लिए| उत्तर की दिशा दूसरे और कामो के लिए बहुत अच्छी है पढ़ना है लिखना है अभ्यास करना है ! उत्तर दिशा मे करे ! लेकिन सोने के लिए उत्तर दिशा बिलकुल निषिद्ध है|
अब बागभट्ट जी ने तो लिख दिया| पर राजीव भाई इस पर कुछ रिसर्च किया, तो राजीव भाई लिखते हैं कि गाव गाव जब मैं घूमता था तो किसी कि मृत्यु हो जाती तो मुझे अगर किसी के संस्कार पर जाना पड़ता, तो वहाँ मैं देखता कि पंडित जी खड़े हो गए संस्कार के लिए, और संस्कार के सूत्र बोलना वो शुरू करते हैं| तो पहला ही सूत्र वो बोलते हैं ! मृत का शरीर उत्तर मे करो मतलब सिर उत्तर मे करो| पहला ही मंत्र बोलेंगे मृत व्यक्ति का सिर उत्तर मे करो| और हमारे देश मे आर्य समाज के संस्थापक रहे दयानंद सरस्वती जी| भारत मे जो संस्कार होते है| जन्म का संस्कार है, गर्भधारण का एक संस्कार है ऐसे ही मृत्यु भी एक संस्कार (अंतिम संस्कार) है तो उन्होने एक पुस्तक लिखी है (संस्कार विधि) ! तो उसमे अंतिम संस्कार की विधि मे पहला ही सूत्र है ! मृत का शरीर उत्तर मे करो फिर विधि शुरू करो !
अब ये तो हुआ बागभट्ट जी, दयानंद जी आदि लोगो का,
अब इसमे विज्ञान क्या है वो समझे|
ये राजीव भाई का अपना explaination है –
क्यूँ ????
आज का जो हमारा दिमाग है न वो क्यूँ ? के बिना मानता ही नहीं !
क्यूँ क्यूँ ऐसा करे ???
कारण उसका बिलकुल सपष्ट है ! आधुनिक विज्ञान ये कहता है आपका जो शरीर है, और आपकी पृथ्वी है इन दोनों के बीच एक बल काम करता है इसको हम कहते हैं गुरुत्वाकर्षण बल (GRAVITATION force )!
इसको आप ऐसे समझे जैसे आपने कभी दो चुंबक अपने हाथ मे लिए होंगे और आपने देखा होगा कि वो हमेशा एक तरफ से तो चिपक जाते हैं पर दूसरी तरफ से नहीं चिपकते ! दूसरे तरफ से वे एक दूसरे को धक्का मारते है ! तो ये इस लिए होता है चुंबक कि दो side होती है एक south एक north ! जब भी आप south और south को या north और north को जोड़ोगे तो वो एक दूसरे को धक्का मारेंगे चिपकेगे नहीं ! लेकिन चुंबक के south और north एक दूसरे से चिपक जाते है !!
अब इस बात को दिमाग मे रख कर आगे पढे
अब ये शरीर पर कैसे काम करता है, तो आप जानते है कि पृथ्वी का उत्तर और पृथ्वी का दक्षिण ये सबसे ज्यादा तीव्र है गुरुत्वाकर्षण के लिए| पृथ्वी का उत्तर पृथ्वी का दक्षिण एक चुंबक कि तरह काम करता गुरुत्वाकर्षण के लिए| अब ध्यान से पढ़े !आपका जो शरीर है उसका जो सिर वाला भाग है वो है उत्तर ! और पैर वो है दक्षिण| अब मान लो आप उत्तर कि तरफ सिर करके सो गए| अब पृथ्वी का उत्तर और सिर का उत्तर दोनों साथ मे आयें तो force of repulsion काम करता है ये विज्ञान ये कहता है ! यह लेख आप राजीव दीक्षित जी डॉट कौम पर पढ़ रहे है..
force of repulsion मतलब प्रतिकर्षण बल लगेगा ! तो आप समझो उत्तर मे जैसे ही आप सिर रखोगे प्रतिकर्षण बल काम करेगा धक्का देने वाला बल !तो आपके शरीर मे संकुचन आएगा contraction. शरीर मे अगर संकुचन आया तो रक्त का प्रवाह blood pressure पूरी तरह से control के बाहर जाएगा !क्यूँ की शरीर को pressure आया तो blood को भी pressure आएगा| तो अगर खून को pressure है तो नींद आएगी ही नहीं| मन मे हमेशा चंचलता रहेगी|दिल की गति हमेशा तेज रहेगी, तो उत्तर की दिशा पृथ्वी की है जो north pol कहलाती है| और हमारे शरीर का उत्तर ये है सिर, अगर दोनों एक तरफ है तो force of repulsion (प्रतिकर्षण बल ) काम करेगा नींद आएगी ही नहीं !
अब इसका उल्टा कर दो आपका सिर दक्षिण मे कर दो ! तो आपका सिर north है उत्तर है ! और पृथ्वी की दक्षिण दिशा मे रखा हुआ है ! तो force of attraction काम करेगा ! एक बल आपको खींचेगा !और आपके शरीर मे अगर खीचाव पड़ेगा मान ली जिये अगर आप लेटे हैं !और ये पृथ्वी का दक्षिण है और इधर आपका सिर है !तो आपको खिंचेगा और शरीर थोड़ा सा बड़ा होगा ! जैसे रबड़ खीचती है न ? elasticity ! थोड़ा सा बढ़ाव आएगा ! जैसे ही शरीर थोड़ा सा बड़ा तो body मे relaxation आ गया !
उदारण के लिए जैसे आप अंगड़ाई लेते हैं न एक दम !शरीर को तान देते है फिर आपको क्या लगता है ? बहुत अच्छा लगता है !क्यूँ की शरीर को ताना शरीर मे थोड़ा बढ़ाव आया और आप बहुत relax feel करते हैं|
इसलिए बागभट्ट जी ने कहा की दक्षिण मे सिर करेगे तो force of attraction है ! उत्तर मे सिर करेगे तो force of repulsion है ! force of repulsion से शरीर पर दबाव पड़ता है| force of attraction से शरीर पर खीचाव पड़ता है ! खीचाव और दबाव एक दूसरे के विपरीत है ! दबाव से शरीर मे संकुचन आएगा दबाव से शरीर मे थोड़ा सा फैलाव आएगा| फैलाव है तो आप सुखी नींद लेंगे, और अगर दबाव है तो नींद नही आएगी है|
इस लिए बागभट्ट जी ने सबसे बढ़िया विश्लेषण दिया है, ये विश्लेषण जिंदगी मे सारे मानसिक रोगो को खत्म करने का उतम उपाय है| नींद अच्छी ले रहे है तो सबसे ज्यादा शांति है, इस लिए नींद आप अच्छी ले ! दक्षिण मे सिर करके सोये नहीं तो पूर्व मे !!
अब पूर्व क्या है ?
पूर्व के बारे मे पृथ्वी पर रिसर्च करने वाले सब वैज्ञानिको का कहना है ! की पूर्व नूट्रल है ! मतलब न तो वहाँ force of attraction है ज्यादा न force of repulsion. और अगर है भी तो दोनों एक दूसरे को balance किए हुए हैं, इस लिए पूर्व मे सिर करके सोयेगे तो आप भी नूट्रल रहेंगे आसानी से नींद आएगी !
पश्चिम का पुछेगे जी !??
तो पश्चिम पर रिसर्च होना अभी बाकी है !
बागभट्ट जी मौन है उस पर कोई explanation देकर नहीं गए हैं !
और आज का विज्ञान भी लगा हुआ है इसके बारे भी तक कुछ पता नहीं चल पाया है !
तो इन तीन दिशाओ का ध्यान रखे !
उत्तर मे कभी सिर मत करे !
पूर्व या दक्षिण मे करे !
बस एक अंतिम बात का ध्यान रखे !
को साधू संत है या सन्यासी है ! जिहोने विवाह आदि नहीं किया ! वो हमेशा पूर्व मे सिर करके सोये ! और जो गृहस्थ आश्रम मे जी रहे है, विवाह के बंधन मे बंधे है, परिवार चला रहे है| वो हमेशा दक्षिण मे सिर करके सोये|
अगर आपको पोस्ट अच्छा लगा तो दुसरो को बताए ओर अपने फेसबुक ओर व्हात्सप्प के माध्यम से जानकारी को शेयर करे .

1




रोजाना खाने-पीने वाली चीजें या उनमें इस्तेमाल होने वाले मसालों में मिलावट होना आम बात है। इनमें कई ऐसे रसायन या हानिकारक तत्व यूज किए जाते हैं, जिसके हेल्थ पर बुरे रिजल्ट देख जा सकते हैं। इसलिए इनसे अलर्ट रहना जरूरी है। आज rajivdixitji.com में पढ़ें कि किन फूड प्रोडक्ट्स में क्या-क्या मिलाया जाता है और फल-सब्जियों को कैसे कम समय में आर्टिफिशियल तरीके से समय से पहले तैयार किया जाता 






फूड डेस्क। ब्रिटेन के प्रोफेसर ज्होन युडकीन ने अपने रिसर्च से साबित किया है कि शक्कर व्हाइट प्वाइजन है। “इस रिसर्च में जो उन्होंने बताया ये सब राजीव भाई 10 साल पहले ही बता चुके थे”. इसे खाने से ब्लड में कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ता है जिससे ब्लड वेसल्स की दीवारें मोटी हो जाती हैं और हार्ट अटैक की संभावना बढ़ती है। सिर्फ शक्कर ही नहीं बल्कि और भी कई फूड है जिनका असर स्लो प्वाइजन की तरह बॉडी पर होता है।

हम बता रहे हैं ऐसे ही 10 फूड के बारे में >>>

शक्कर: इसे खाने से लीवर में गलाइकोजन की मात्रा कम होती है, जिससे मोटापा, थकान, माइग्रेन, अस्थमा और डायबिटीज बढ़ सकती है, ज्यादा खाने से बुढ़ापा जल्दी आता है

आयोडीन नमक :- इसमे सोडियम की मात्रा अधिक होती है, ज्यादा खाने से हाई BP की संभावना बढती है जिससे हार्ट अटैक हो सकता है. इससे कैंसर और आस्तियोपोरोसिस के चांस बढ़ते है

मैदा :- मैदा बनाने की प्रोसेस में फाइबर निकल जाते है, ज्यादा मैदा खाने से लगातार पेट की प्रॉब्लम होती है. इसमे बलिचिंग एजेंट होते है. जो खून पतला करते है और हार्ट प्रॉब्लम बढ़ाते है




कोल्ड ड्रिंक :- इसमे शक्कर और फास्फोरिक एसिड की मात्रा ज्यादा होती है, ज्यादा कोल्ड ड्रिंक पिने से ब्रेन डैमेज या हार्ट अटैक हो सकता है, और इससे बड़ी आंत तक सड जाती है अमिताभ बच्चन के साथ यही हुआ था


फ़ास्ट फ़ूड :- इसमे  मोनोसोडियम ग्लूटामेट होता है जिससे ब्रेन पॉवर कम होती है और मोटापा तेजी से बढ़ता है. साथ ही हार्ट प्रॉब्लम का खतरा बढ़ता है.



अंकुरित आलू :-  इसमे ग्लाइकोअल्केलाइड्स होते है जिससे डायरिया हो सकता है, इसी तरह के आलू लगातार खाने से सिर दर्द या बेहोशी हो सकती है


मशरूम :- कच्चे मशरूम में कार्सिनोजेनिक कंपाउंड होते है जिससे कैंसर के चांस बढ़ते है इसलिये मशरूम को अच्छी तरह उबालने के बाद ही यूज़ करना चाहिए.



राजमा :- कच्चे राजमा में ग्लाईकोप्रोटीन लेकितन होता है जिससे उलटी या इनडाईजेशन की प्रॉब्लम लगातार बनी रहती है. इसलिये राजमा को हमेशा अच्छी तरह उबालकर खाना चाहिए

जायफल:- इसमे myristicin होता है जिससे बार – बार हार्ट रेट बढती है, उलटी और मुह सूखने की प्रॉब्लम लगातार बनी रहती है. ज्यादा खाने से ब्रेन पॉवर कम होती है.




देवेंद्र शर्मा @ भोपाल. क्या आप जानते हैं जो आइसक्रीम आप खा रहे हैं, वो आपके दिल-लीवर के लिए खतरनाक है। राजधानी भोपाल में देश की बड़ी कंपनियां आइसक्रीम के नाम पर घी-तेल खिला रही हैं। वनस्पति घी-ऑयल में चॉकलेट-वनीला-स्ट्राबेरी जैसे फ्लेवर मिलाकर आइसक्रीम बनाने वाली कंपनियों ने खुद को कानूनी पचड़े से बचाने के लिए पैक पर ‘फ्रोजन डिसर्ट कंटेन एडेबल ऑयल’ का टैग लगा रखा है।



आम लोग इस टैग का मतलब नहीं समझ पाते कि पूरी आइसक्रीम ही वनस्पति घी या तेल से बनी है। आइसक्रीम पर छपे टैग का मतलब है कि तेल-घी से बनाया गया मीठा पदार्थ। बहरहाल सच्चाई जांचने के खाद्य विभाग की लैब में नामचीन ब्रांड की आइसक्रीम की जांच कराई तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ। आइसक्रीम में मिल्क फैट की मात्रा 16 फीसदी होनी चाहिए, लेकिन घी-तेल वाली आइसक्रीम में यह मात्रा सिर्फ 5.5 प्रतिशत मिली। शेष वनस्पति घी और विभिन्न फ्लेवर का मिश्रण था। डॉक्टरों के मुताबिक ऐसी आइसक्रीम खाने से दिल और लिवर के खतरे बढ़ जाते हैं, साथ ही मोटापा भी तेजी से बढ़ता है।

कंपनिया दूध की बजाय इस्तेमाल कर रही खतरनाक केमिकल, वनस्पति घी, तेल जो दिल और लीवर,कैंसर जैसे खतरनाक बीमारी पैदा कर रही है
घी वाली आइसक्रीम से खतरे
  1. मोटापा बढ़ता है, याददाश्त कमजोर होती है। साथ ही पेट का हिस्सा थुलथुल हो जाता है
  1. कोलेस्ट्रल बढ़ता है, जिसके कारण ब्लॉकेज होते हैं और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है
  1. लिवर बढऩे की आशंका बहुत ज्यादा रहती है। लिवर बढऩे से कई अंग प्रभावित होते हैं
क्वालिटी प्रोडक्ट नहीं होते फ्रोजन डिसर्टफ्रोजन डिसर्ट
यानी वनस्पति घी को जमाकर बनाया गया प्रोडक्ट। ऐसे प्रोडक्ट में क्रीम के नाम पर अव्वल कुछ होता नहीं है, या फिर नाममात्र की क्रीम मिलाई जाती है। जांच में सामने आया कि नामचीन कंपनियों की कुछ आइसक्रीम में क्रीम की मात्रा मौजूद थी, जबकि कुछ प्रोडक्ट में नदारद। ऐसी आइसक्रीम लगातार खाने से हार्ट अटैक और लिवर फेल होने का खतरा बढ़ जाता है।
असली आइसक्रीम का मतलब समझिए
फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड रेग्यूलेशन एक्ट-2011 के अनुसार असली आइसक्रीम में सिर्फ दूध, दूध से बने प्रोडक्ट, शक्कर और मनचाहा फ्लेवर होना चाहिए। नियमानुसार 16 फीसदी मिल्क क्रीम होनी चाहिए। यह आइसक्रीम बनाना खर्चीला होता है, साथ ही कसावट भी कमजोर होती है। इसलिए घी-तेल का इस्तेमाल होने लगा।
घी-तेल वाली में क्रीम नहीं होती
फ्रोजन डिजर्ड दरअसल, फल-फूल-सब्जियों से बनाए गए वनस्पति घी में मिल्क क्रीम की थोड़ी मात्रा मिलाकर बनाया जाता है। पड़ताल में सामने आया कि फ्रोजन डिसर्ट बनाने में ग्राउंड नट्स ऑयल, कॉटन नट्स ऑयल, सन फ्लॉवर ऑयल, मस्टर्ड सोया का इस्तेमाल किया गया है।
जांच का निष्कर्ष
  1. नामचीन कंपनियों की आइसक्रीम में निर्धारित 16 फीसदी फैट की मात्रा के बजाय सिर्फ 13.50 प्रतिशत निकली। इसमे भी मिल्क क्रीम सिर्फ 5.5 फीसदी थी, शेष वनस्पति घी।
  1. दुग्ध उत्पाद शुद्धता तय करने वाला ब्यूटीरोरीफेक्टरोमीटर मानक घी वाली आइसक्रीम में 44.5 प्रतिशत निकला, जबकि दूध वाली आइसक्रीम में 40 फीसदी होना चाहिए।
  1. घी वाली आइसक्रीम में टोटल सॉलिड 52.24 प्रतिशत निकला। दूध वाली आइसक्रीम में यह सिर्फ 36 फीसदी होती है। यह टोटल सॉलिड ही बीमारियों का प्रमुख कारण बनता है।
इनका कहना है…
वेजिटेबल ऑयल व वनस्पति घी से बनी आइसक्रीम खाने से सबसे बड़ा नुकसान तो शरीर में एलडीएल यानी खराब वसा बढऩे के तौर पर सामने आता है। यह कोलेस्ट्रोल बढ़ाता है। शरीर में जम जाता है, धमनियों में ब्लॉकेज बढ़ाकर दिल के लिए खतरा बनता है। डॉ. आदर्श वाजपेयी, मेडिसिन
फ्रोजन डिजर्ट खाना वनस्पति घी का सेवन करने जैसा है। ऐसी आइसक्रीम ज्यादा खाने से न सिर्फ दिल, बल्कि लिवर भी प्रभावित होता है। जाहिर है कि पाचन शक्ति बिगड़ेगी और शरीर के तमाम अंग प्रभावित होंगे। -डॉ. शौकत आबिद, गैस्ट्रोलॉजिस्ट


बारिश के मौसम में मच्छरों को पनपने का माहौल मिल जाता है। ऐसे में ही डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियां को बढ़ावा मिलता है। आप चाहें तो इन मच्छरों को घर से दूर रखकर सेहत का ध्यान रख सकते हैं। इसके लिए घर में ही बड़े आसान उपाय मौजूद हैं। जरूरत है तो बस इन्हें जानने की।



1- घर के अंदर अरोमेटिक कैंडल जलाए. इसकी सुगंध से भी मचछर भाग जाते है. आप चाहे तो लेवेंडर आयल में कॉटन बोल्स डीप करके भी रूम में रख सकते है.
2- 
काफी पाउडर से भी मचछर दूर भागते है. घर में आसपास जहा भी पानी इकठा हो. वहा कॉफ़ी पाउडर छिड़क दे. ये लार्वा का भी खात्मा कर देगा.
3- 
कमरे में कपूर जलाकर रखे और सभी खिड़की – दरवाजे 15 मिनत के लिये बंद कर दे. इसकी स्मेल से मचछर भाग जायेंगे.
4- 
नीम के तेल का दिया घर में जलाए. इससे घर के अंदर मौजूद मचछर भाग जायेंगे.
5- लेमन आयल आयर यूकेलिप्ट्स आयल को मिक्स करके शारीर के खुले हिस्से पर लगाना चाहिए. इससे मचछर नहीं काटेगे.
6- 
नीम की सुखी पत्तियों को जलाकर घर के अन्दर धुआं देने से भी कोने कोने में छिपे मचछर पर जाते है.
7- 
लुहसून की स्मेल भी मचछर बर्दास्त नहीं कर पाते. लहसुन की कुछ कलियाँ क्रशकरके बोयल करे और पानी ठंडा होने पर घर के कोनो में स्प्रे करे.
8- 
घर में तुलसी का पौधा लगाए. इससे मचछर घर में नहीं पनपेगे. पुदीना के पौधे भी इसमे हेल्प फुल है चाहे तो मिंट आयल का स्प्रे भी घर में कर सकते है.
9- एक कंटेनर में ड्राई आइस रखे. यह कार्बन डाइऑक्साइड का सॉलिड फॉर्म है . मचछर इसके पास जायेंगे तो इसकी स्मेल से दौबारा लोटकर नहीं आएंगे.
10- 
एक बाउल में बियर लेकर कमरे में रख दे. मचछर अट्रेक्ट होकर आएंगे और इसमे मर जायेंगे.



हमारे देश में एक अमेरिकी कंपनी है – नेस्ले , नेस्ले बेबी पावडर (डब्बे का दूध) बेचती है | यूरोप के देशों में बेबी पावडर बिकता नहीं, यूरोप के देशों में बेबी पावडर को बेबी किलर कहते हैं | मैंने यूरोप के कई देशों में देखा है, बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे रहते हैं और सरकार की तरफ से उन होर्डिंगों पर प्रचार किया जाता है कि “आप अपने बच्चे को बेबी पावडर मत खिलाईये” | क्यों ? क्योंकि इसमें जहर है, तो पुरे यूरोप में ये जो बेबी पावडर “बेबी किलर” कहा जाता है वही बेबी पावडर धड़ल्ले से भारत के बाजार में बिक रहा है और बहुत वर्षों तक इस देश में जो बेबी पावडर बिकता था, उसके डब्बे पर कुछ भी लिखा नहीं होता था, जब कुछ अच्छे लोगों ने इस मुद्दे को उठाया, राजीव भाई जैसे विचार वाले कुछ डोक्टरों ने संसद पर दबाव बनाया तब भारत की सरकार ने सिर्फ इतना सा संसोधन कर दिया कि “कंपनियों को बेबी पावडर के डब्बे पर ये लिखना आवश्यक होगा कि माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम है”, बस बात ख़त्म | होता ये कि भारत सरकार इन डब्बे के दूध को भारत में प्रतिबंधित कर देती, लेकिन नहीं |



और भारत की पढ़ी-लिखी माताओं की हालत भी कुछ वैसी ही है, जो जितनी ज्यादा पढ़ी-लिखी हैं वो उतना ही ज्यादा बेबी पावडर पिलाती हैं अपने बच्चों को | कभी-कभी तो मुझे ये लगता है कि जैसे भारत में जब से बेबी पावडर आया है तभी से बच्चे जवान हो रहे हैं, बिना बेबी पावडर के तो लोग बड़े ही नहीं हुए होंगे इस देश में ?
चंद्र शेखर आजाद ,भगत सिंह ,उधम सिंह,महाराणा प्रताप ,शिवाजी लाखो क्रांतिकारी क्या सब बेबी पावडर पीकर फांसी पर चढ़े ? कुछ ऐसा ही माहौल बनाया गया है इस देश में पिछले कुछ वर्षों से, और विरोधाभास क्या है इस देश में कि बाजार में बेबी पावडर भी बिक रहा है और “माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम है” इस विषय पर सेमिनार भी आयोजित किये जाते हैं, करोड़ो रूपये खर्च कर के | सीधा ये नहीं करते कि बेबी पावडर को प्रतिबंधित कर दे इस देश में | जिनको समझना चाहिए कि “माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम है” वो सेमिनार में आते नहीं और जिनको ये समझ है वो कोई कैम्पेन चलाते नहीं, ये इस देश का दुर्भाग्य है |


नई दिल्ली : कभी जूस तो कभी सॉफ्ट ड्रिंक को सिप्पी कप के सहारे गटकने की आदत बच्चों को जल्द जवां बना रही है। पर्यावरण शोध और सलाहकार संगठन टॉक्सिक्स लिंक के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि बच्चों के लिए बाजार में उपलब्ध सिप्पी कप सुरक्षित नहीं हैं। इन कप को खतरनाक बना रहा है



इनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाला बिसफिनोल-ए (बीपीए) रसायन। यह रसायन हार्मोन सिस्टम पर असर डालकर बच्चों के विकास को प्रभावित करता है। इसके प्रभाव से जहां लड़कियों में मासिकधर्म शुरू होने की उम्र में कमी हो रही है, वहीं लड़कों में यौवन का विकास जल्द हो रहा है।
टॉक्सिक्स लिंक के वरिष्ठ प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर पीयूष महापात्रा ने बताया कि इस अध्ययन में दिल्ली के विभिन्न बाजारों से सिप्पी कप के 13 नमूने एकत्र किए गए। इनकी जांच दिल्ली के श्रीराम औद्योगिक शोध संस्थान (एसआइआइआर) से कराई गई। रिपोर्ट में सामने आया कि 13 में से 10 नमूनों में बीपीए है। यानी 77 फीसद नमूनों में बिसफिनोल -ए है। सिप्पी कप में बीपीए की मात्रा 14.9 पीपीएम (पार्ट प्रति मिलियन) के उच्च स्तर तक है, जोकि बेहद हानिकारक है। हैरानी की बात तो यह है कि इन उत्पादों को बाजार में बीपीए मुक्त का लेबल लगाकर बेचा जा रहा है। उपभोक्ताओं के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे वे सुनिश्चित कर सकें कि कौन सा सिप्पी कप उनके बच्चे के लिए सुरक्षित है।
टॉक्सिक्स लिंक के सह निदेशक सतीश सिन्हा कहते हैं कि कई देश सिप्पी कप के हानिकारक प्रभाव को देखते हुए उन्हें चरणबद्ध तरीके से खत्म कर चुके हैं। लेकिन भारत में यह नवजात बच्चों के दूध की बोतल में इस्तेमाल होने वाले निपल में तो प्रतिबंधित है, लेकिन सिप्पी कपों के निर्माण में इनके प्रयोग पर सरकार खामोश है। सिप्पी कप को उत्पादन, आपूर्ति और वितरण विनियमन अधिनियम 1992 के तहत लाया जाना जरूरी है। टॉक्सिक्स लिंक के निदेशक रवि अग्रवाल कहते हैं कि उत्पादों में इस तरह से रसायनों के इस्तेमाल को लेकर व्यापक नीति व मानक निर्धारित करने की जरूरत है।
क्या है बिसफिनोल-ए 
बिसफिनोल-ए (बीपीए) ऐसा रसायन है जो अंत:स्राव में गड़बड़ी करता है। शिशुओं के हार्मोन में गड़बड़ी करने के अलावा बीपीए तीन साल तक की लड़कियों के व्यवहार और भावनात्मक पहलुओं पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। लड़कों की बात करें तो इसके दुष्प्रभाव से उनमें अवसाद व चिंता का भाव बढ़ता है। बीपीए सामान्य तौर पर शरीर में हृदय रोग, यकृत में विषाक्तता और मधुमेह का कारण बनता है। प्लास्टिक उत्पाद सिप्पी कप के निर्माण में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है, जोकि बच्चों के लिए हानिकारक है।
गर्भपात की आशंका अधिक 
अमेरिकन सोसायटी फॉर रिप्रोडक्टिव मेडिसिन (एएसआरएम) ने पाया है कि जिन महिलाओं के खून में बीपीए की मात्रा अधिक होती है, उनमें गर्भपात की आशंका उन महिलाओं की तुलना में अधिक होती है जिनके खून में बीपीए का स्तर निम्नतम है।
व्यवहार पर डालता है असर 
244 माताओं पर किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया है कि जन्म से पहले बीपीए से जुड़ा जोखिम तीन साल की उम्र में लड़कियों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget